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बी आर ए आई बिल विधेयक को लेकर घमासान , किसान संगठनों ने आन्दोलन की दी चेतावनी

बिहार ऑब्जर्वर:पटना,  राष्ट्रीय जैव प्रौद्यागिकी नियामक प्राधिकरण विधेयक (बी आर ए आई बिल) दिनांक अप्रैल को केन्द्रीय विज्ञान एवं तकनीकी तथा पृथ्वी विज्ञान मंत्री श्री जयपाल रेड्डी द्वारा केंद्रीय लोक सभा में बड़े नाटकीय ढंग से पेश कर दिया गया. विदित हो कि केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा राष्ट्रीय जैव प्रौद्यागिकी नियामक प्राधिकरण विधेयक (BRAI Bill,बायोटेक्नोलॉजी रेगुलेटरी ऑथीरटी ऑफ इन्डिया बिल) कि मंजूरी दे दी गई थी जो संसद में विगत दो वर्षों से लंबित था. इसका मुख्य कारण है कि इस् बिल में राज्यों के संवैधानिक अधिकारों को छीनने की कोशिश की गई हैं साथ ही साथ इसके पारित होने से सूचना के अधिकार अधिनियम एवं पर्यावरण संरक्षण अधिनियम का भी हनन होगा तथा हमारी खाद्य सुरक्षा एवं किसानी पर बड़ा सवाल खड़ा होगा।

यह बातें जी एम मुक्त बिहार अभियान के संयोजक एवं कोलीशन फॉर जी एम फ्री इंडिया के सह संयोजक पंकज भूषण ने कहा।श्री भूषण ने केन्द्रीय विज्ञान एवं तकनीकी तथा पृथ्वी विज्ञान मंत्री श्री जयपाल रेड्डी को पत्र भेजते हुए निवेदन कहा कि इस् बिल पर तुरत ही रोक लगायी जाये साथ हीं उन्होंने बिहार के मुख्य मंत्री को पत्र के माध्यम से अनुरोध किया है की अविलम्ब इस् बिल को रोकने की शिफारिश की जाये, साथ हीं उन्होंने यह भी अनुरोध किया की यदि इस् बिल पर रोक नहीं लगती है तब इसे संयुक्त समिति को अग्रसारित किया जाये या संसदीय कृषि समिति को दिया जाये।विदित हो कि इस् बिल के विरुद्ध बिहार के पूर्व मुख्य मंत्री एवं सांसद श्री रामसुंदर दास, पूर्व केंद्रीय मंत्री-सांसद एवं तत्कालीन भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष डा० सी पी ठाकुर, सांसद एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री कैप्टन जय नारायण निषाद, सांसद श्रीमती अश्वमेधा देवी, तत्कालीन सांसद स्व० उमा शंकर सिंह, सांसद ओम् प्रकाश यादव, सांसद डा० अनिल कुमार साहनी, पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं सांसद रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे कई सांसदों ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी ताकि यह बिल संसद में पेश नहीं किया जाये, परन्तु केंद्र सरकार ने बगैर कोई संसोधन के इस् बिल को लोक सभा में पेश कर दिया. प्रस्तावित विधेयक में जन सहभागिता के लिए कोई जगह नहीं है।

जैव विविधता के बारे में कार्टाजेना प्रोटोकॉल (जैव विविधता समझौते के तहत) के अनुच्छेद 23.2 में साफ कहा गया है कि जी0 एम0 के मामले में फैसला लेते समय जन सहभागिता भी सुनिश्चित की जानी चाहिए। भारत इस संधि का हस्ताक्षरकर्ता है। इससे एक तरफ राष्ट्र के नागरिकों के हक का भी हनन होगा और दूसरी तरफ पर्यावरण पर भी गंभीर खतरे के बादल मंडराने लगेंगे।

इस् विधेयक में कृषि और स्वास्थ्य पर राज्यों के संवैधानिक अधिकार को छीनने की कोशिश की गई है जो कि देश के संघीय ढ़ाँचें की व्यवस्था का घोर उल्लंघन है। प्रस्तावित विधेयक में राज्य सरकारों को राज्य बायोटेक्नोलॉजी नियामक सलाहकार समिति में सिर्फ सलाह देने तक ही सीमित रखा गया है। इसे दो कारणों से स्वीकारा नहीं जा सकता है। पहला कृषि और स्वास्थ्य राज्य का विषय है और दूसरा इसमें जैव विविधता कानून बनाने के राज्यों से अधिकार को छीना जा रहा है। ऐसे में यह फैसला जैव विविधता के संरक्षण और उसे बरकरार रखने के लिए एक विकेन्द्रीकृत प्राधिकरण की व्यवस्था का भी उल्लंघन है। खाशकर इस समय यह बिल बहुराष्ट्रीय कंपनियों के स्वार्थ में पेश किया गया है जब बिहार, केरल, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, छत्तीसगढ़ ओडिशा एवं पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों ने जी एम फसलों के परिक्षण को मना कर चुके हैं।

अब देश भर के हजारों गांव खुद को जीएम मुक्त घोषित कर रहे हैं।जी एम फ्री बिहार के संयोजक बबलू कुमार ने कहा कि यह जग जाहिर हो चुका है कि बिहार के मुख्य मंत्री के पहल पर बिहार में बी टी बैंगन की खेती एवं जी एम मक्के का परिक्षण रुका, साथ हीं एक नियम भी बन गया कि किसी तरह के परिक्षण के पूर्व राज्य सरकार की अनुमति आवश्यक होगी। फिर इस बिल का क्या अचित्य है? अतः उन्होंने मुख्य मंत्री बिहार से माँग की है कि जैसे बिहार सरकार ने बीज विधेयक पर किसानों के स्वार्थ में घनघोर आपत्ति की थी उसी प्रकार बिहार सरकार हमारी किसानी एवं पर्यावरण की रक्षा हेतु पुनः इस् बिल पर आपति प्रकट करते हुए केंद्र सरकार को अपने मंतव्य से अवगत करावे. उन्होंने कहा कि जिस तरह मध्य प्रदेश सरकार द्वारा कड़ी आपत्ति दर्ज करते हुए केंद्र को प्रस्ताव भेजा जा चुका है, उसी तरह बिहार सरकार भी अविलम्ब आपत्ति दर्ज करे ताकि हमारी किसानी बच सके।

अभी हाल में प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक एम. एस. स्वामीनाथन ने कहा कि यह बिल महात्मा गाँधी की भावना के विरुद्ध है, जिसमे खाशकर जैव परिवर्धित फसलों की स्वीकृति के लिए एकल खिड़की की व्यवस्था है। साथ हीं सूचना के जन अधिकार का राष्ट्रीय अभियान से जुड़ीं राष्ट्रीय सलाहकार समिति की सदस्या एवं समाजसेवी अरुणा राय ने भी हाल में हीं प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से इस विधेयक के धारा 2, 28, 70, 77 पर कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए कहा कि इस विधेयक के पारित होने के बाद इससे संबंधित कोई भी सूचना प्राप्त नहीं होगा और उसे गोपनीय ठहरा दिया जाएगा जो कि सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 का सरासर उल्लंघन है। जिससे भारतीय गणतंत्र के नागरिकों के अधिकारों का हनन होगा।

किसान-मजदूर गठबन्धन के प्रदेश अध्यक्ष कृष्णा सिंह ने कहा कि यह बिल बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बहकावे में आकर केंद्र सरकार ने पेश किया है जिससे हमारी किसानी तबाह हो जायेगी, जिन जैव परिवर्धित बीजों (जी एम) को बिहार सरकार ने रोककर एक ऐतिहासिक कार्य किया है, अब इस् बिल के आ जाने के बाद पुनः काविज हो जायेगा. उन्होंने कहा कि अंतिम चरण तक हम इस् बिल के खिलाफ लड़ेंगे और जरूरत हुई तब गठबन्धन इस् के लिय आन्दोलन भी शुरू करेगा. खाद्य सुरक्षा पर बल देते हुए कहा कि यह भी ध्यान रखने योग्य है कि हमारा भोजन असुरक्षित होता जा रहा है। जीएम फसलों व खाद्यान्न के आने से उसके जहरीले होने की संभावना भी बढ़ गई है। इसीलिए इस बिल के पेश किये जाने का विरोध करने की जरूरत है।

Biotech regulator Bill draws flak

Press Trust of India  |  Vadodara  April 24, 2013

Some NGOs here have demanded the withdrawal of a Bill which seeks to establish an independent regulator for the biotech sector, calling it “anti-people and pro-MNCs”. 

The Biotechnology Regulatory Authority of India Bill was introduced in the Lok Sabha on April 22. The proposed regulator covers research, transport, import, manufacture and use of organisms and products of modern biotechnology. 

Coalition for a GM-Free India and Akhil Gujarat Sajiv Kheti Samaj (Gujarat unit of Organic Farming Association of India) have demanded withdrawal of the Bill, calling it a “retrograde” piece of legislation. 

Sridhar Radhakrishnan, Convenor of Coalition for a GM-Free India, Prashant Bhushan, its Co-convener, and Kapil Shah, Secretary of the state unit of the Association, said MPs across parties should oppose this “anti-people” Bill. 

This would prevent the government from handing over control of India’s food and seed to a few multi-national companies in the biotechnology sector, they said. 

They alleged that the Congress-led UPA Government has tabled a “deeply flawed” Bill despite strong opposition within and outside Parliament. 

“How can promoter of the Bill (Science and Technology Ministry) become a regulator when various other Ministries, including Environment, Forests and Agriculture, are involved in this subject?” Bhushan asked. 

Radhakrishnan claimed that “the Bill overlooks the ever-increasing evidence on impacts of genetically modified organisms (GMOs) on human health, biodiversity and socio-economic aspects.” 

Terming the Bill as “anti-farmer and anti-consumer,” they demanded it be withdrawn.

GM-Free Bihar Movement Cries Foul Over BRAI Bill

Bill introduced despite opposition within and outside Parliament

Patna, 24th April 2013: The GM-Free Bihar Movement today expressed deep anguish at the Central Government’s action of introducing the Biotechnology Regulatory Authority of India (BRAI) Bill 2013 in Parliament despite serious reservations of parliamentarians, scientists, civil society groups and farmers.

“This Bill, dubbed as a ‘wrong bill by the wrong people for wrong reasons’ in its various versions has been extremely controversial due to provisions facilitating the biotechnology industry at the expense of public good,” GM-Free Bihar Movement Convener Mr. Pankaj Bhushan said in a press release here.

The Bill’s flawed approach to regulation in trying to create a single window clearing house for products of modern biotechnology, instead of an express mandate to protect and uphold bio-safety given the acknowledged risks of modern biotechnology, has been opposed time and again.

“As we have reiterated on numerous occasions, the Bill is steeped in conflict of interest as the Ministry promoting biotechnology is about to house the regulator; it undermines the federal polity of our nation by overriding the authority of state governments, even though Agriculture is a State Subject as per the Indian Constitution. It also attempts to circumvent the right to information and transparency laws and is focussed on creating a three member technocratic, undemocratic and centralised decision making body. As the Bt brinjal moratorium decision shows us, even a more broad-based regulatory body had gone wrong with its decision-making – why can’t the government learn lessons from the past and aspire for a progressive legislation in the interest of Indian citizens and environment, rather than promote corporate interests?” Bhushan said.

The problems with this technology particularly in our food and farming systems, where the genetically modified organisms (GMOs) are released into the environment are widely known and documented. “The Bill introduced in Parliament on April 22, 2013 overlooks the ever-increasing evidence on the impacts of GMOs on human health, biodiversity and socioeconomic aspects and lacks any scientific independent, long term assessment to look at the safety as well as the very need of GMOs before their open release.”

Bhushan termed the bill anti-farmer and anti-consumer, saying, if passed, it will only result in people losing control over food choices and seed sovereignty. “The bill should be withdrawn,” he demanded.

BACKGROUND:

The introduction of this Bill at this juncture is all the more shocking and unacceptable, given the following recommendation from the Parliamentary Standing Committee on Agriculture which studied the subject in detail and presented its report to Parliament in August 2012:

The Government has been for some years now toying with the idea of a Biotechnology Regulatory Authority. The Committee feels that regulating biotechnology is too small a focus in the vast canvas of biodiversity, environment, human and livestock health, etc. and a multitude of other such related issues. They have, therefore, already recommended in a previous Chapter setting up of an all encompassing Bio-safety Authority through an Act of Parliament, which is extensively discussed and debated amongst all stakeholders, before acquiring shape of the law. Unless and until such an authority is in place, any further movement in regard to transgenics in agriculture crops will obviously be fraught with unknown consequences. (Section 8.120)

Analysing the lacunae of the existing regulation and studying the proposed Biotechnology Regulatory Authority of India, the Standing Committee said the following:

“In such a situation what the Country needs is not a biotechnology regulatory legislation but an all encompassing umbrella legislation on biosafety which is focused on ensuring the biosafety, biodiversity, human and livestock health, environmental protection and which specifically describes the extent to which biotechnology, including modern biotechnology, fits in the scheme of things without compromising with the safety of any of the elements mentioned above”.

The GM-Free Bihar Movement strongly urges that Parliamentarians cutting across the political spectrum should respond to this retrograde and anti-people bill and prevent the control over our food and seed by a few biotechnology majors.  Discussing the Bill in a limited context of a Standing Committee on Science & Technology would not suffice, given the large potential impact of the issue at hand.

We demand that the government show its sensitivity to the broad based opposition by withdrawing the bill. We urge Parliamentarians to ask for circulation to elicit  response and understand the importance and need to set up a Joint  Committee in this current instance (ideally headed by the Chairperson of the Agriculture Standing Committee, given its deep links to farmers’ livelihoods, an issue pertaining to the largest number of Indians).

BT cotton behind farmer suicides?

  • March 28, 2012
  • By Rashme Sehgal
  • Correspondent
  • New Delhi

Despite having unleashed more than 780 Bt cotton hybrids in India during the last decade, yields have turned stagnant and farmer suicides in the cotton belt are multiplying.

In fact, although Bt cotton now covers more than 90 per cent of the total cotton growing area in the country, yields in the last five years have gone up marginally from 470 kg per ha to 481 kg per ha though input costs have increased several fold, warned member NGOs of the Coalition for GM-Free India.
Crop failure is also being attributed to the increasing number of pests found to be attacking Bt cotton hybrids. The result is that state government estimates in Andhra Pradesh show that 34 lakh acres out of the 47 lakh acres planted with Bt cotton during the kharif 2011 season faced crop failure with almost 21 lakh farmers having lost around `3071 crores.
The situation is no better in Maharashtra where Bt cotton farmers have already lost over `10,000 crores due to crop failure. Dr Suman Sahai of Gene Campaign warns, “The crisis is so acute in Maharashtra that 209 farmers committed suicide in the Vidarbha cotton growing belt region in 2011.’’
Kishor Tiwari of the Vidarbha Jan Andolan Samiti told this reporter that when Bt cotton was first introduced in 2002, seed companies had promised it would be bollworm resistant. But today, new pests have emerged.
Dr Sahai concurs, “Indian conditions are different from the West. We are a tropical country with a variety of pests which have been found to be adversely affecting this cotton crop.”
But at the village level, farmers continue to buy Bt cotton because the only credit available to them from seed agents is for Bt seeds against other traditional varieties.
“Seed agents are offered higher commission for Bt cotton rather than for traditional seeds,’’ Dr Sahai added.

जाओ किसान भगवान, मर जाओ!

http://visfot.com/home/index.php/permalink/5480.html

bewas kisaan

एक बहस होगी लोकसभा में। बहस के पहले ही पूरी संसद और पूरा देश लोकपाल की बहस पर लटक गया है लेकिन एक बहस हुई राज्यसभा में। पूरे दो दिन। लेकिन न किसी न जाना और न किसी ने सुना। वे सांसद भी अनमने ही बहस में शामिल हुए जिनकी संजीदगी से बहुत कुछ बदल सकता था। किसानों की आत्महत्या क्या सचमुच इतना असंवेदनशील विषय है कि हमारी संसद भी लंबे अंतराल के बाद मौन तोड़ती भी है तो सरकार सुनती नहीं और मीडिया सुध नहीं देता. क्या किसानों के इस देश में किसान इस कदर हाशिये पर फेक दिया गया है कि उसकी दुर्दशा पर ध्यान देनेवाला कोई नहीं है? शेषनारायण सिंह का विश्लेषण-

किसानों की आत्मह्त्या देश की राजनीतिक पार्टियों को हमेशा मुश्किल में डालती रहती है .हालांकि मीडिया आम तौर पर किसानों की आत्महत्या की बात करने से बचता है लेकिन कुछ ऐसे पत्रकार हैं जो इस मामले पर समय समय बहस का माहौल बनाते रहते हैं. देश के कुछ इलाकों में तो हालात बहुत ही बिगड़ गए हैं और लोगों की समझ में नहीं आ रहा है कि समस्या का हल किस तरह से निकाला जाए. हो सकता है कि इन्हीं कारणों से संसद के शीतकालीन सत्र में राज्यसभा ने समय निकाला और किसानों की आत्महत्या से पैदा हुए सवाल पर दो दिन की बहस कर डाली. बीजेपी के वेंकैया नायडू की नोटिस पर नियम १७६ के तहत अल्पकालिक चर्चा में बहुत सारे ऐसे मुद्दे सामने आये जिसके बाद कि संसद ने इस विषय पर बात को आगे बढाने का मन बनाया. बहस के दौरान सदस्यों ने मांग की कि इसी विषय पर चर्चा के लिए सदन का एक विशेष सत्र बुलाया जाए .बहस के अंत में इस बात पर सहमति बन गयी कि सदन की एक कमेटी बनायी जाए जो किसानों की आत्महत्या के कारणों पर गंभीर विचार विमर्श करे और सदन को जल्द से जल्द रिपोर्ट पेश करे. बाद में लोकसभा में सीपीएम के नेता और कृषि मंत्रालय की स्थायी समिति के अध्यक्ष, बासुदेव आचार्य ने लोकसभा स्पीकर से मिल कर आग्रह किया कि राज्यसभा की जो कमेटी बनने वाली है उसमें लोकसभा के सदस्य भी शामिल हो जाएँ तो कमेटी एक जेपीसी की शक्ल अख्तियार कर लेगी.

राज्यसभा में बहस की शुरुआत करते हुए बीजेपी के वेंकैया नायडू ने किसानों की आत्मह्त्या और खेती के सामने पेश आ रही बाकी दिक्क़तों का सिलसिलेवार ज़िक्र किया. उन्होंने कृषि लागत और मूल्य आयोग की आलोचना की और कहा कि उस संस्था का तरीका वैज्ञानिक नहीं है. वह पुराने लागत के आंकड़ों की मदद से आज की फसल की कीमत तय करते हैं जिसकी वजह से किसान ठगा रह जाता है. फसल बीमा के विषय पर भी उन्होंने सरकार को सीधे तौर पर कटघरे में खड़ा किया. खेती की लागत की चीज़ों की कीमत लगातार बढ़ रही है लेकिन किसान की बात को कोई भी सही तरीके से नहीं सोच रहा है जिसके कारण इस देश में किसान तबाह होता जा रहा है .उन्होंने कहा कि जी डी पी में तो सात से आठ प्रतिशत की वृद्धि हो रही है जबकि खेती की विकास दर केवल २ प्रतिशत के आस पास है . उन्होंने कहा कि किसानों को जो सरकारी समर्थन मूल्य मिलता है वह बहुत कम है . उन्होंने इसके लिए भी सरकार को ज़िम्मेदार ठहराया .बहस में कई पार्टियों के सदस्यों ने हिस्सा लिया लेकिन नामजद सदस्य,मणिशंकर अय्यर ने  किसानों की समस्याओं को सही परिप्रेक्ष्य में लाने की कोशिश की. उन्होंने साफ़ कहा कि आत्महत्या करने वाले किसान वे नहीं होते जो खाद्यान्न की खेती में लगे होते हैं और आमतौर पर सरकारी समर्थन मूल्य पर निर्भर करते हैं.

किसानों की आत्मह्त्या के ज़्यादातर मामले उन इलाकों से सुनने में आ रहे हैं जहां नकदी फसल उगाई जा रही है. नकदी फसल के लिए किसानों को लागत बहुत ज्यादा लगानी पड़ती है. नकदी फसल के किसान पर देश के अंदर हो रही उथल पुथल का उतना ज्यादा असर नहीं पड़ता जितना कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रही अर्थव्यवस्था के उतार-चढाव का पड़ता है. जब उनके माल की कीमत दुनिया के बाजारों में कम हो जाती है तो उसके सामने संकट पैदा हो जाता है. वह अपनी फसल में बहुत ज़्यादा लागत लगा चुका होता है. लागत का बड़ा हिस्सा क़र्ज़ के रूप में लिया गया होता है. माल को रोकना उसके बूते की बात नहीं होती. सरकार की गैर ज़िम्मेदारी का आलम यह है कि खेती के लिए क़र्ज़ लेने वाले किसान को छोटे उद्योगों के लिए मिलने वाले क़र्ज़ से ज्यादा ब्याज देना पड़ता है.एक बार भी अगर फसल खराब हो गयी तो दोबारा पिछली फसल के घाटे को संभालने के लिए वह अगली फसल में ज्यादा पूंजी लगा देता है. अगर लगातार दो तीन साल तक फसल खराब हो गयी तो मुसीबत आ जाती है. किसान क़र्ज़ के भंवरजाल में फंस जाता है. जिसके बाद उसके लिए बाकी ज़िंदगी बंधुआ मजदूर के रूप में क़र्ज़ वापस करते रहने के लिए काम करने का विकल्प रह जाता है. किसानों की आत्म हत्या के कारणों की तह में जाने पर पता चलता है कि ज़्यादातर समस्या यही है. राज्यसभा में बहस के दौरान यह साफ़ समझ में आ गया कि ज़्यादातर सदस्य आपने इलाकों  के किसानों की समस्याओं का उल्लेख करने के एक मंच के रूप में ही समय बिताते रहे.

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सीताराम येचुरी ने समस्या के शास्त्रीय पक्ष पर बात की, सदन में भी और सदन के बाहर भी. उन्होंने सरकार की नीयत पर ही सवाल उठाया और कहा कि अपने जवाब में कृषिमंत्री ने जिस तरह से आंकड़ों का खेल किया है वह  किसानों की आत्महत्या जैसे सवाल को कमज़ोर रोशनी में पेश करने का काम करता है. उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया कि २००७ के एक जवाब में सरकार ने कहा था कि नैशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो का आंकड़ा किसानों की आत्महत्या के मामले में ही सही आंकड़ा है जबकि जब राज्यसभा में इस विषय पर हुई दो दिन की बहस का जवाब केन्द्रीय कृषि मंत्री महोदय दे रहे थे तो उन्होंने राज्य सरकारों से मिले आंकड़ों का हवाला दिया. सीताराम येचुरी ने आरोप लगाया कि यह सरकार की गलती है. कोई भी मुख्यमंत्री या राज्य सरकार आमतौर पर यह स्वीकार करने में संकोच करती है कि उसके राज्य में किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहे हैं. उन्होंने उन अर्थशास्त्रियों को भी आड़े हाथों लिया जो आर्थिक सुधारों के बल पर देश की अर्थव्यवस्था में सुधार लाने की कोशिश कर रहे हैं. सीताराम ने साफ़ कहा कि जब तक इस देश के किसान खुशहाल नहीं होगा तह तह अर्थव्यवस्था में किसी तरह की तरक्की के सपने देखना बेमतलब है. उन्होंने साफ़ कहा कि जब तक खेती में सरकारी निवेश नहीं बढाया जाएगा, भण्डारण और विपणन की सुविधाओं के ढांचागत  निवेश का बंदोबस्त नहीं होगा तब तक इस देश में किसान को वही कुछ झेलना पड़ेगा जो अभी वह झेल रहा है. उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया कि पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के नाम पर खेती से जुडी हर लाभकारी स्कीम को एमएनसी के हवाले करने की जो योजना सरकारी चर्चाओं में सुनने में आ रही है वह बहुत ही चिंताकारक है.

एक दिन की बहस के बाद जब कृषिमंत्री शरद पवार ने जवाब दिया तो लगभग तस्वीर साफ़ हो गयी कि सरकार इतने अहम मसले पर भी लीपापोती का काम करने के चक्कर में है .सरकार की तरफ से कृषि मंत्री ने एक हैरत अंगेज़ बात भी कुबूल कर डाली . उन्होंने कहा कि इस देश में २७ प्रतिशत किसान ऐसे हैं जो खेती को लाभदायक नहीं. बाद में जनता दल ( यू ) के शिवानन्द  तिवारी ने कहा कि कृषिमंत्री के बयान से लगता है कि २७ प्रतिशत किसान खेती छोड़ना चाहते हैं. उन्होंने कहा कि यह २७ प्रतिशत किसान का मतलब यह है कि देश के करीब १७ करोड़ किसान खेती से पिंड छुडाना चाहते हैं. यह बात बहुत ही चिंता का कारण है. भारत एक कृषिप्रधान देश है और यहाँ आबादी का एक बड़ा हिस्सा खेती से अलग होना चाहता है. कृषिमंत्री ने इस बात को भी स्वीकार किया कि रासायनिक खादों को भी किसानों को उपलब्ध कराने में सरकार असमर्थ है. उन्होंने कहा कि दुनिया के कई देशों में खाद उत्पादन करने वाली बड़ी कंपनियों ने गिरोह बना रखा है और वे भारत सरकार से मनमानी कीमतें वसूल कर रहे हैं. सरकार ऐसी हालत में मजबूर है. उन्होंने इस बात पार भी लाचारी दिखाई कि सरकार किसानों को सूदखोरों के जाल में जाने से नहीं बचा सकती. बहरहाल सरकार की लाचारी भरे जवाब के बाद यह साफ़ हो गया है कि इस देश में किसान को कोई भी राजनीतिक या सरकारी समर्थन मिलने वाला नहीं है. किसान को इस सरकार ने रामभरोसे छोड़ दिया है.

WRONG BILL BY WRONG PEOPLE FOR WRONG REASONS

BRAI BILL 2011 IS NO BETTER THAN ANTI-PEOPLE, ANTI-NATURE BRAI 2009

August 16th 2011: The BRAI Bill is a blatant attempt to bulldoze through the public resistance and genuine concerns about Genetically Modified crops, and to deny state governments their Constitutional authority over Agriculture and Health, said the Coalition for a GM-Free India in its reaction to the Biotechnology Regulatory Authority of India  2011 Bill to be introduced in the Parliament tomorrow. The Coalition urged Parliamentarians to object to the very introduction of the Bill in the Parliament tomorrow, stating that ‘it is a wrong bill by the wrong people for the wrong reasons’. The scam-ridden UPA government will only take a further beating in the eyes of the public if it tries to introduce and pass this Bill, warned the Coalition.

“This BRAI mechanism makes the regulatory system even weaker than the existing GEAC mechanism. As the nation remembers, the Bt Brinjal public hearings process saw state governments, farmer organizations, scientists, environmentalists, health experts and rest of civil society come out with huge concerns about GM crops, and the Government through its moratorium decision admitted the failure of GEAC regulatory mechanism and promised to strengthen the regulatory system. How can the same Government bring in a regulatory mechanism which is actually much weaker than GEAC and which overrides the state governments, local governments and public inputs?” demanded the Coalition.

“As we have said all along, regulation of modern biotechnology is not like regulation as in other sectors like telecom, where corrupt politicians and bureaucrats can hope to make money. The fundamental basis of regulation lies in the risks associated with modern biotechnology. Therefore, there should only be one primary mandate or objective to this statute: to prevent risks to the health and safety of people of India, its environment and its biological diversity in particular, from the development, handling, transport, use, transfer and release of any living modified organisms. Given such a mandate, this Bill should be introduced not by the Ministry of Science and Technology but by the Ministry of Health or Ministry of Environment & Forests. The current Bill is objectionable on such fundamental grounds apart from its other failings,” said the Coalition in a press release.

The following are the main objections listed out by the Coalition in response to this Bill:

1.            Wrong Ministry introducing it with wrong objectives: As mentioned above, there should be only one reason why this Bill should be enacted and that should be to uphold the biosafety of the people of India and its environment from the risks of modern biotechnology. If a technology is inherently unsafe, no amount of regulation can make it safer as is the case with the use of Genetic Engineering in our food and farming systems. Given that this statute is trying to replace the current regulatory regime as governed by the EPA’s 1989 Rules which have been expressly formulated to protect health, Nature and environment from the risks of modern biotechnology, there should be a strong, rational reason why the same will not be the objective for BRAI. What new scientific evidence or other evidence has emerged since then that this objective is being changed to also introduce fast-track clearance systems in the name of ‘effective and efficient’ regulatory procedures?

2.            Over-riding state governments’ authority over their agriculture and health: This Bill has a clause in the very first chapter (Section (2)) which seeks to keep the regulatory control in the hands of Union Government, in the name of “public interest”. This is unconstitutional and retrogressive, especially given the recent change in regulatory norms in India, rightfully so for the first time, allowing state governments to have a greater say in the deployment of modern biotechnology especially in the context of field trials/environmental release of GMOs.

3.            Bypassing the citizens’ Right to Information: This Bill, through Section 28, expressly seeks to classify some information as Confidential Commercial Information and leaves it to the discretion of officials of the Authority to share or not share this information. This once again is regressive, given that the Bt brinjal controversy saw express Supreme Court orders to the regulators asking them to put out all the biosafety data in the public domain. What is the point in incorporating a component of obtaining public feedback through Section 27 (5) if the biosafety data is not put out in the public domain? This is completely objectionable and no political party should support clauses like this.

The same is true to the Oath of Secrecy that the Authority Chair and Members are expected to take in addition to other officials. Why is modern biotechnology and its deployment a secret affair, unless there is something to hide from the public? How can this Authority be trusted to act in the best interest of Indians with such clauses built in?

4.            3-member Authority to decide for all of us?: The Bill essentially proposes that a 3-member Authority, with support from 2 other part-time members will take decisions, even though certain new mechanisms like the Environment Appraisal Panel have been introduced, compared to the last version of the Bill seen in 2010. However, this Authority has been vested with all powers to decide and while it appears that the authority will take recommendations of Risk Assessment Unit and Products Ruling Committee, and has seemingly been rid of conflicting interests by placing restrictions on employment after cessation of office etc. (not before joining the Authority and therefore, nothing to prevent some appointee getting a hefty sum before joining the authority and then clearing applications in the corruption-laden systems all around us; similarly, no such restrictions for the officials in the Biosafety Assessment Units or Product Rulings Committee etc., are missing, even though they would be doing the recommendations that would form the basis of decision-making later on!), the entire authority of decision-making rests with this small group of scientists! There are even clauses which prevent invalidation of the proceedings of the Authority by mere vacancies (sic) etc., in this Bill. When an inter-ministerial body 30-member body like the GEAC, which was also taking biosafety recommendations from a group of scientists called the RCGM and acting accordingly, could be found lacking rigour or independence so often in the past, how can this Biotech Regulatory Authority with its 3 full-time and 2 part-time members be trusted and how can Indians place their faith on them? Further, biotech regulation is not just about biosafety for decisions to be taken based on someone declaring something to be ‘safe’. There are issues related to farmers’ rights, consumers’ rights, trade security, sustainable development etc., all linked to modern biotechnology and its applications.

5.            No Needs Evaluation: One of the fundamental recommendations of the Task Force on Agricultural Biotechnology led by Dr.Swaminathan was that “transgenics should be resorted to when other options to achieve the desired objectives are either not available or not feasible.” The BRAI doesn’t talk about any needs evaluation and assessment of alternatives, which was also stressed by the Government in its Bt brinjal moratorium decision – and assumes that all biotechnology and GM crops are a fait accompli.

6.            There are no proposals at all for independent testing which is a great problem witnessed time and again in the current regulatory regime too. Worse, there are proposals of notifying labs under this Act that have not even been accredited!

7.            There are no improvements being made in terms of open air trials not happening before biosafety is thoroughly, independently and democratically assessed. Using quaint terms like ‘environmental release’ for actual commercial cultivation and using other terms like field trials for open air releases even though they are environmental releases too, the proposed Bill has no improvements to suggest to address the serious lacunae with field trials which are making state government after state government reject the possibility of any open air trials taking place in their state.

8.            The Bill has very weak penal clauses (Chapter XII on Offences and Penalties) and in fact does not address liability issues at all: without a liability regime in place, no regulatory regime is complete on this issue. Liability should put the onus of violations on the crop developer primarily and not the users. Further, liability should cover criminal and civil liability as well as redressal/compensation to affected parties like farmers in addition to remediation for damage caused.

9.            It is unacceptable that the Bill has a clause (70) which says that no court shall take cognizance of any offence punishable under this Act save on a complaint made by the Authority or any officer or person authorized by it! What is the rationale for this other than to protect offenders? Equally objectionable is Section 77 which prevents civil courts to have jurisdiction on any matter which the Appellate Tribunal under the Act is empowered to determine, wherein there is a bar on any injunction to be granted by any court in respect of any action taken by the Authority.

10.          It is also objectionable that this Act will have an over-riding effect over other laws in force since this Bill is indeed inconsistent with legislations like the Biological Diversity Act.

The above few points are only some of the main objections. There are several other problems with the Bill in terms of the Appellate Authority proposed, in its Inter-Ministerial Governing Board and its role and constitution etc. etc.


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