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BT cotton behind farmer suicides?

  • March 28, 2012
  • By Rashme Sehgal
  • Correspondent
  • New Delhi

Despite having unleashed more than 780 Bt cotton hybrids in India during the last decade, yields have turned stagnant and farmer suicides in the cotton belt are multiplying.

In fact, although Bt cotton now covers more than 90 per cent of the total cotton growing area in the country, yields in the last five years have gone up marginally from 470 kg per ha to 481 kg per ha though input costs have increased several fold, warned member NGOs of the Coalition for GM-Free India.
Crop failure is also being attributed to the increasing number of pests found to be attacking Bt cotton hybrids. The result is that state government estimates in Andhra Pradesh show that 34 lakh acres out of the 47 lakh acres planted with Bt cotton during the kharif 2011 season faced crop failure with almost 21 lakh farmers having lost around `3071 crores.
The situation is no better in Maharashtra where Bt cotton farmers have already lost over `10,000 crores due to crop failure. Dr Suman Sahai of Gene Campaign warns, “The crisis is so acute in Maharashtra that 209 farmers committed suicide in the Vidarbha cotton growing belt region in 2011.’’
Kishor Tiwari of the Vidarbha Jan Andolan Samiti told this reporter that when Bt cotton was first introduced in 2002, seed companies had promised it would be bollworm resistant. But today, new pests have emerged.
Dr Sahai concurs, “Indian conditions are different from the West. We are a tropical country with a variety of pests which have been found to be adversely affecting this cotton crop.”
But at the village level, farmers continue to buy Bt cotton because the only credit available to them from seed agents is for Bt seeds against other traditional varieties.
“Seed agents are offered higher commission for Bt cotton rather than for traditional seeds,’’ Dr Sahai added.

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Scientists warn EPA on Monsanto corn rootworm

By Carey Gillam

Sat Mar 10, 2012 2:16am IST

(Reuters) – A group of plant scientists is warning federal regulators that action is needed to mitigate a growing problem with biotech corn that is losing its resistance to plant-damaging pests.

The stakes are high – corn production is critical for food, animal feed and ethanol production, and farmers have increasingly been relying on corn that has been genetically modified to be toxic to corn rootworm pests.

“This is not something that is a surprise… but it is something that needs to be addressed,” said Joseph Spencer, a corn entomologist with the Illinois Natural History Survey, part of the University of Illinois.

Spencer is one of 22 academic corn experts who sent a letter dated March 5 to the Environmental Protection Agency telling regulators they are worried about long-term corn production prospects because of the failure of the genetic modifications in corn aimed at protection from rootworm.

Monsanto introduced its corn rootworm protected products, which contain a protein referred to as “Cry3Bb1,” in 2003 and they have proved popular with farmers in key growing areas around the country. Biotech corn sales are a key growth driver of sales at Monsanto.

The corn rootworm product is supposed to reduce the need to put insecticides into the soil, essentially making the corn plants toxic to the worms that try to feed on their roots.

But plant scientists have recently found evidence that the genetic modification is losing its effectiveness, making the plants vulnerable to rootworm damage and potentially significant production losses.

The scientists said in their letter to EPA that the situation should be acted upon “carefully, but with a sense of some urgency.”

As concerns have mounted over the last year that Monsanto’s rootworm-protected products were losing their effectiveness, Monsanto has said the problem is small and has said the products continue to provide corn farmers with “strong protection against this damaging pest.”

Monsanto, the world’s largest seed company, has recommended growers rotate the corn with its biotech soybeans, use another of its biotech corn products and use insecticides to try to address the problem.

“Rootworm performance inquiries in 2011 were isolated to less than 0.2 percent of the acres planted with Monsanto rootworm-traited corn hybrids,” said Danielle Stuart, a Monsanto spokeswoman. “In all of these cases, Monsanto is working very closely with the farmer and has provided best management practices for the upcoming season on each of these fields. “

The problems with insect resistance have been reported in parts of Illinois, Iowa, Minnesota, Nebraska and South Dakota.

Continuing to plant a failing technology only increases the resistance development risk, the scientists said in their letter. Moreover, they say, the rootworm-protected BT corn is being planted in areas that have no need for it, often because there are few alternative seed options. Scarcity of non-BT corn seed is a concern, they said.

Using insecticides along with the biotech corn as Monsanto has advised is not a good approach, according to the scientists, because it elevates production costs for farmers and masks the extent and severity of the building insect resistance.

“Recommendations to apply insecticides to protect transgenic Bt corn rootworm corn strikes us as a clear admission that the Cry3Bb1 toxin is no longer providing control adequate to protect yield,” the scientists wrote.

“When insecticides overlay transgenic technology, the economic and environmental advantages of rootworm-protected corn quickly disappear,” the scientists wrote.

EPA Office of Pesticide Programs Director Steven Bradbury, who the letter was addressed to, could not be reached for comment.

(Reporting By Carey Gillam;editing by Sofina Mirza-Reid)

जाओ किसान भगवान, मर जाओ!

http://visfot.com/home/index.php/permalink/5480.html

bewas kisaan

एक बहस होगी लोकसभा में। बहस के पहले ही पूरी संसद और पूरा देश लोकपाल की बहस पर लटक गया है लेकिन एक बहस हुई राज्यसभा में। पूरे दो दिन। लेकिन न किसी न जाना और न किसी ने सुना। वे सांसद भी अनमने ही बहस में शामिल हुए जिनकी संजीदगी से बहुत कुछ बदल सकता था। किसानों की आत्महत्या क्या सचमुच इतना असंवेदनशील विषय है कि हमारी संसद भी लंबे अंतराल के बाद मौन तोड़ती भी है तो सरकार सुनती नहीं और मीडिया सुध नहीं देता. क्या किसानों के इस देश में किसान इस कदर हाशिये पर फेक दिया गया है कि उसकी दुर्दशा पर ध्यान देनेवाला कोई नहीं है? शेषनारायण सिंह का विश्लेषण-

किसानों की आत्मह्त्या देश की राजनीतिक पार्टियों को हमेशा मुश्किल में डालती रहती है .हालांकि मीडिया आम तौर पर किसानों की आत्महत्या की बात करने से बचता है लेकिन कुछ ऐसे पत्रकार हैं जो इस मामले पर समय समय बहस का माहौल बनाते रहते हैं. देश के कुछ इलाकों में तो हालात बहुत ही बिगड़ गए हैं और लोगों की समझ में नहीं आ रहा है कि समस्या का हल किस तरह से निकाला जाए. हो सकता है कि इन्हीं कारणों से संसद के शीतकालीन सत्र में राज्यसभा ने समय निकाला और किसानों की आत्महत्या से पैदा हुए सवाल पर दो दिन की बहस कर डाली. बीजेपी के वेंकैया नायडू की नोटिस पर नियम १७६ के तहत अल्पकालिक चर्चा में बहुत सारे ऐसे मुद्दे सामने आये जिसके बाद कि संसद ने इस विषय पर बात को आगे बढाने का मन बनाया. बहस के दौरान सदस्यों ने मांग की कि इसी विषय पर चर्चा के लिए सदन का एक विशेष सत्र बुलाया जाए .बहस के अंत में इस बात पर सहमति बन गयी कि सदन की एक कमेटी बनायी जाए जो किसानों की आत्महत्या के कारणों पर गंभीर विचार विमर्श करे और सदन को जल्द से जल्द रिपोर्ट पेश करे. बाद में लोकसभा में सीपीएम के नेता और कृषि मंत्रालय की स्थायी समिति के अध्यक्ष, बासुदेव आचार्य ने लोकसभा स्पीकर से मिल कर आग्रह किया कि राज्यसभा की जो कमेटी बनने वाली है उसमें लोकसभा के सदस्य भी शामिल हो जाएँ तो कमेटी एक जेपीसी की शक्ल अख्तियार कर लेगी.

राज्यसभा में बहस की शुरुआत करते हुए बीजेपी के वेंकैया नायडू ने किसानों की आत्मह्त्या और खेती के सामने पेश आ रही बाकी दिक्क़तों का सिलसिलेवार ज़िक्र किया. उन्होंने कृषि लागत और मूल्य आयोग की आलोचना की और कहा कि उस संस्था का तरीका वैज्ञानिक नहीं है. वह पुराने लागत के आंकड़ों की मदद से आज की फसल की कीमत तय करते हैं जिसकी वजह से किसान ठगा रह जाता है. फसल बीमा के विषय पर भी उन्होंने सरकार को सीधे तौर पर कटघरे में खड़ा किया. खेती की लागत की चीज़ों की कीमत लगातार बढ़ रही है लेकिन किसान की बात को कोई भी सही तरीके से नहीं सोच रहा है जिसके कारण इस देश में किसान तबाह होता जा रहा है .उन्होंने कहा कि जी डी पी में तो सात से आठ प्रतिशत की वृद्धि हो रही है जबकि खेती की विकास दर केवल २ प्रतिशत के आस पास है . उन्होंने कहा कि किसानों को जो सरकारी समर्थन मूल्य मिलता है वह बहुत कम है . उन्होंने इसके लिए भी सरकार को ज़िम्मेदार ठहराया .बहस में कई पार्टियों के सदस्यों ने हिस्सा लिया लेकिन नामजद सदस्य,मणिशंकर अय्यर ने  किसानों की समस्याओं को सही परिप्रेक्ष्य में लाने की कोशिश की. उन्होंने साफ़ कहा कि आत्महत्या करने वाले किसान वे नहीं होते जो खाद्यान्न की खेती में लगे होते हैं और आमतौर पर सरकारी समर्थन मूल्य पर निर्भर करते हैं.

किसानों की आत्मह्त्या के ज़्यादातर मामले उन इलाकों से सुनने में आ रहे हैं जहां नकदी फसल उगाई जा रही है. नकदी फसल के लिए किसानों को लागत बहुत ज्यादा लगानी पड़ती है. नकदी फसल के किसान पर देश के अंदर हो रही उथल पुथल का उतना ज्यादा असर नहीं पड़ता जितना कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रही अर्थव्यवस्था के उतार-चढाव का पड़ता है. जब उनके माल की कीमत दुनिया के बाजारों में कम हो जाती है तो उसके सामने संकट पैदा हो जाता है. वह अपनी फसल में बहुत ज़्यादा लागत लगा चुका होता है. लागत का बड़ा हिस्सा क़र्ज़ के रूप में लिया गया होता है. माल को रोकना उसके बूते की बात नहीं होती. सरकार की गैर ज़िम्मेदारी का आलम यह है कि खेती के लिए क़र्ज़ लेने वाले किसान को छोटे उद्योगों के लिए मिलने वाले क़र्ज़ से ज्यादा ब्याज देना पड़ता है.एक बार भी अगर फसल खराब हो गयी तो दोबारा पिछली फसल के घाटे को संभालने के लिए वह अगली फसल में ज्यादा पूंजी लगा देता है. अगर लगातार दो तीन साल तक फसल खराब हो गयी तो मुसीबत आ जाती है. किसान क़र्ज़ के भंवरजाल में फंस जाता है. जिसके बाद उसके लिए बाकी ज़िंदगी बंधुआ मजदूर के रूप में क़र्ज़ वापस करते रहने के लिए काम करने का विकल्प रह जाता है. किसानों की आत्म हत्या के कारणों की तह में जाने पर पता चलता है कि ज़्यादातर समस्या यही है. राज्यसभा में बहस के दौरान यह साफ़ समझ में आ गया कि ज़्यादातर सदस्य आपने इलाकों  के किसानों की समस्याओं का उल्लेख करने के एक मंच के रूप में ही समय बिताते रहे.

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सीताराम येचुरी ने समस्या के शास्त्रीय पक्ष पर बात की, सदन में भी और सदन के बाहर भी. उन्होंने सरकार की नीयत पर ही सवाल उठाया और कहा कि अपने जवाब में कृषिमंत्री ने जिस तरह से आंकड़ों का खेल किया है वह  किसानों की आत्महत्या जैसे सवाल को कमज़ोर रोशनी में पेश करने का काम करता है. उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया कि २००७ के एक जवाब में सरकार ने कहा था कि नैशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो का आंकड़ा किसानों की आत्महत्या के मामले में ही सही आंकड़ा है जबकि जब राज्यसभा में इस विषय पर हुई दो दिन की बहस का जवाब केन्द्रीय कृषि मंत्री महोदय दे रहे थे तो उन्होंने राज्य सरकारों से मिले आंकड़ों का हवाला दिया. सीताराम येचुरी ने आरोप लगाया कि यह सरकार की गलती है. कोई भी मुख्यमंत्री या राज्य सरकार आमतौर पर यह स्वीकार करने में संकोच करती है कि उसके राज्य में किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहे हैं. उन्होंने उन अर्थशास्त्रियों को भी आड़े हाथों लिया जो आर्थिक सुधारों के बल पर देश की अर्थव्यवस्था में सुधार लाने की कोशिश कर रहे हैं. सीताराम ने साफ़ कहा कि जब तक इस देश के किसान खुशहाल नहीं होगा तह तह अर्थव्यवस्था में किसी तरह की तरक्की के सपने देखना बेमतलब है. उन्होंने साफ़ कहा कि जब तक खेती में सरकारी निवेश नहीं बढाया जाएगा, भण्डारण और विपणन की सुविधाओं के ढांचागत  निवेश का बंदोबस्त नहीं होगा तब तक इस देश में किसान को वही कुछ झेलना पड़ेगा जो अभी वह झेल रहा है. उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया कि पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के नाम पर खेती से जुडी हर लाभकारी स्कीम को एमएनसी के हवाले करने की जो योजना सरकारी चर्चाओं में सुनने में आ रही है वह बहुत ही चिंताकारक है.

एक दिन की बहस के बाद जब कृषिमंत्री शरद पवार ने जवाब दिया तो लगभग तस्वीर साफ़ हो गयी कि सरकार इतने अहम मसले पर भी लीपापोती का काम करने के चक्कर में है .सरकार की तरफ से कृषि मंत्री ने एक हैरत अंगेज़ बात भी कुबूल कर डाली . उन्होंने कहा कि इस देश में २७ प्रतिशत किसान ऐसे हैं जो खेती को लाभदायक नहीं. बाद में जनता दल ( यू ) के शिवानन्द  तिवारी ने कहा कि कृषिमंत्री के बयान से लगता है कि २७ प्रतिशत किसान खेती छोड़ना चाहते हैं. उन्होंने कहा कि यह २७ प्रतिशत किसान का मतलब यह है कि देश के करीब १७ करोड़ किसान खेती से पिंड छुडाना चाहते हैं. यह बात बहुत ही चिंता का कारण है. भारत एक कृषिप्रधान देश है और यहाँ आबादी का एक बड़ा हिस्सा खेती से अलग होना चाहता है. कृषिमंत्री ने इस बात को भी स्वीकार किया कि रासायनिक खादों को भी किसानों को उपलब्ध कराने में सरकार असमर्थ है. उन्होंने कहा कि दुनिया के कई देशों में खाद उत्पादन करने वाली बड़ी कंपनियों ने गिरोह बना रखा है और वे भारत सरकार से मनमानी कीमतें वसूल कर रहे हैं. सरकार ऐसी हालत में मजबूर है. उन्होंने इस बात पार भी लाचारी दिखाई कि सरकार किसानों को सूदखोरों के जाल में जाने से नहीं बचा सकती. बहरहाल सरकार की लाचारी भरे जवाब के बाद यह साफ़ हो गया है कि इस देश में किसान को कोई भी राजनीतिक या सरकारी समर्थन मिलने वाला नहीं है. किसान को इस सरकार ने रामभरोसे छोड़ दिया है.

Letter to Dr.Manmohan Singh, PM on Biotechnology Bill by Law Makers

Letter to the Prime Minister of India by Shree R S Das, MP

Stop BRAI Bill

Raghuvansh Prasad Singh: BRAI Bill – Bulldozing public opinion

The government has finalised the draft of the Biotechnology Regulatory Authority of India (BRAI) Bill. A close reading of the draft shows that, on the one hand, this Bill intends to provide single-window clearance to genetically-modified (GM) crops promoted by multinational seed companies; on the other, it ignores the possible risks and threats to our agriculture, health and environment from this controversial technology.

The nation saw a widespread debate on Bt brinjal, the first GM food crop to have been considered for commercial cultivation in the country. Public consultations organised during that debate clearly highlighted the objections and concerns of all sections of society, including scientists, on GM foods in general and Bt brinjal in particular.

Despite the moratorium, there have been many efforts in the past several months to overlook the legitimate concerns over GM crops and this proposed regulatory system called BRAI is one such significant effort.Twelve state governments, including the largest brinjal-cultivating states – West Bengal, Bihar and Odisha – expressed their concerns with regard to this novel and unnatural GM food crop. The government responded rightly to the diverse voices all around and placed a moratorium on the commercial release of Bt brinjal on February 9, 2010.

A hasty move in the wrong direction

The fact that the draft of the Bill was not put in the public domain and the haste with which the Bill was listed for tabling – it was given to the MPs just a few hours before its scheduled introduction in the Lok Sabha on August 17 – makes it clear that the government is in no mood for an informed debate either inside or outside Parliament on BRAI. It was thanks to the raging anti-corruption debates in the Lok Sabha that the Bill could not be introduced by the ministry of science and technology.

The problems with the current proposal of the regulatory system starts with the conflicting interest in which ministry is tabling the Bill, the ministry of science and technology that also has the mandate to promote GM crops in the country. The Bill also proposes to have an appellate tribunal that is the sole forum for redressal. This is a scary situation in which the promoter himself becomes the regulator, prosecutor and the judge. This is the recipe for a corrupt autocratic system.

One of the biggest issues with the current regulatory system, with the Genetic Engineering Appraisal Committee (GEAC) as the nodal agency, was that it overrules the constitutional role of state governments in policy decisions regarding agriculture and health. After almost 13 years of existence and resistance to it, the GEAC recently amended its rules to give state governments the decision-making power on the approval of field trials, which is the first level of open release of GM crops. The proposed BRAI seeks to reverse this and take control of decisions related to any open releases of GM crops, be it for experiments or for commercialisation. This is clearly an unconstitutional move since agriculture and health, two sectors that would be impacted by GM crops, are under the state list of the Indian Constitution and states should have a role in deciding anything that has an impact on these sectors.

Adding to the unconstitutionality is the powers that have been given to the five-member Biotechnology Regulatory Authority to override the provisions in the Right to Information Act, 2005.

The provisions laid out in Section 2, Section 28, Section 70 and Section 77 of this Bill undermine the fundamental right to freedom of speech and expression, and the right to life, by violating the provisions and protection of the RTI Act. And by preventing civil courts to have jurisdiction on any matter under the Act.

Anti-farmer and anti-people

This draft Bill clearly intends to circumvent opposition to GM and to facilitate the monopolisation of our seed sector by multinational seed giants like Monsanto. Besides having the wrong mandate, the proposals are completely sidestepping the precautionary approach and not addressing all the serious shortcomings of the existing regulatory regime. The BRAI proposal does not talk about the mandate of protecting India’s environment and health from the risks of modern biotechnology, which should be the primary mandate for any regulatory regime.

Given the growing concern in the country about the impact of GM crops to our health, our farmers livelihoods and food and seed sovereignty, it is high time that the government recognises it. Instead of coming up with such cantankerous legislations as the BRAI Bill to promote risky technologies like genetic modification, it should go after real solutions that are economically, socially and environmentally sustainable.

In the light of public concern on GM crops and such blatant violations of constitutional rights in the current BRAI Bill version, the prime minister should not let his science and technology minister introduce the BRAI Bill in Parliament without widespread public consultations.

The author represents the Vaishali constituency of Bihar in the Lok Sabha and is a member of the Rashtriya Janata Dal. He was Union cabinet minister for rural development in the first United Progressive Alliance Cabinet

Letters to PM on crop trials

OUR SPECIAL CORRESPONDENT

Patna, Nov. 7: Three NDA MPs from Bihar — C.P. Thakur of the BJP, Jai Narayan Nishad and Anil Kumar Sahani of the JD(U)— have written separate letters to Prime Minister Manmohan Singh expressing concern over reports of Biotechnology Regulatory Authority of India (BRAI) bill being introduced in the winter session of Parliament.

They have sought an intervention to stop the process in the interest of farmers. “I have strong objections to it being infringement on the authority of the state on matters related to agriculture and health,” said Thakur in his letter. He also objected to the fact that the proposed bill would be tabled by the ministry of science and technology when it should have been under the ministry of environment or health.

Jai Narayan Nishad, in his letter, has pointed out that seven states — Bihar, Bengal, Orissa, Madhya Pradesh, Chhattisgarh, Karnataka and Kerala — have already objected to genetically modified crop trials. “You must also be aware that during the Bt Brinjal debate, 13 states had objected to the approval for its commercial cultivation,” Nishad said, adding that the bill and its provisions are going to leave behind a large impact because the livelihood of most of the people of the country depends on agriculture.

He has also expressed apprehensions about degradation of environment resources and serious changes in crop because of GM crops. “I believe you will agree that regulatory regime that does not pay attention to these issues, bio-safety-related as well as those beyond bio-safety, will only benefit the industry and fail our vast majority of poor,” Nishad said.

Sahani in his letter stressed that he has found the contents of the proposed bill “too centralised and thereby contradictory to the principle of decentralisation of governance”, he remarked recalling that the Bihar government had not only objected to the trial of genetic seeds within its state but also apprised the environment ministry of its strong objection to GM field trials. He urged the PM to take public opinion through debates and invite critical inputs before the bill is introduced in Parliament.

Chief minister Nitish Kumar has been in the forefront of objecting the proposed bill. A few months ago, he had written letters stressing that the proposed bill infringes on the rights of the state and that there was no provision for timely compensation to the farmers should the GM seeds fail.

He had been swift to oppose GM seed trial in Sabour and had expressed shock that the trials should have been done without the consent of the state government.


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