Archive for the 'ASHA' Category

जाओ किसान भगवान, मर जाओ!

http://visfot.com/home/index.php/permalink/5480.html

bewas kisaan

एक बहस होगी लोकसभा में। बहस के पहले ही पूरी संसद और पूरा देश लोकपाल की बहस पर लटक गया है लेकिन एक बहस हुई राज्यसभा में। पूरे दो दिन। लेकिन न किसी न जाना और न किसी ने सुना। वे सांसद भी अनमने ही बहस में शामिल हुए जिनकी संजीदगी से बहुत कुछ बदल सकता था। किसानों की आत्महत्या क्या सचमुच इतना असंवेदनशील विषय है कि हमारी संसद भी लंबे अंतराल के बाद मौन तोड़ती भी है तो सरकार सुनती नहीं और मीडिया सुध नहीं देता. क्या किसानों के इस देश में किसान इस कदर हाशिये पर फेक दिया गया है कि उसकी दुर्दशा पर ध्यान देनेवाला कोई नहीं है? शेषनारायण सिंह का विश्लेषण-

किसानों की आत्मह्त्या देश की राजनीतिक पार्टियों को हमेशा मुश्किल में डालती रहती है .हालांकि मीडिया आम तौर पर किसानों की आत्महत्या की बात करने से बचता है लेकिन कुछ ऐसे पत्रकार हैं जो इस मामले पर समय समय बहस का माहौल बनाते रहते हैं. देश के कुछ इलाकों में तो हालात बहुत ही बिगड़ गए हैं और लोगों की समझ में नहीं आ रहा है कि समस्या का हल किस तरह से निकाला जाए. हो सकता है कि इन्हीं कारणों से संसद के शीतकालीन सत्र में राज्यसभा ने समय निकाला और किसानों की आत्महत्या से पैदा हुए सवाल पर दो दिन की बहस कर डाली. बीजेपी के वेंकैया नायडू की नोटिस पर नियम १७६ के तहत अल्पकालिक चर्चा में बहुत सारे ऐसे मुद्दे सामने आये जिसके बाद कि संसद ने इस विषय पर बात को आगे बढाने का मन बनाया. बहस के दौरान सदस्यों ने मांग की कि इसी विषय पर चर्चा के लिए सदन का एक विशेष सत्र बुलाया जाए .बहस के अंत में इस बात पर सहमति बन गयी कि सदन की एक कमेटी बनायी जाए जो किसानों की आत्महत्या के कारणों पर गंभीर विचार विमर्श करे और सदन को जल्द से जल्द रिपोर्ट पेश करे. बाद में लोकसभा में सीपीएम के नेता और कृषि मंत्रालय की स्थायी समिति के अध्यक्ष, बासुदेव आचार्य ने लोकसभा स्पीकर से मिल कर आग्रह किया कि राज्यसभा की जो कमेटी बनने वाली है उसमें लोकसभा के सदस्य भी शामिल हो जाएँ तो कमेटी एक जेपीसी की शक्ल अख्तियार कर लेगी.

राज्यसभा में बहस की शुरुआत करते हुए बीजेपी के वेंकैया नायडू ने किसानों की आत्मह्त्या और खेती के सामने पेश आ रही बाकी दिक्क़तों का सिलसिलेवार ज़िक्र किया. उन्होंने कृषि लागत और मूल्य आयोग की आलोचना की और कहा कि उस संस्था का तरीका वैज्ञानिक नहीं है. वह पुराने लागत के आंकड़ों की मदद से आज की फसल की कीमत तय करते हैं जिसकी वजह से किसान ठगा रह जाता है. फसल बीमा के विषय पर भी उन्होंने सरकार को सीधे तौर पर कटघरे में खड़ा किया. खेती की लागत की चीज़ों की कीमत लगातार बढ़ रही है लेकिन किसान की बात को कोई भी सही तरीके से नहीं सोच रहा है जिसके कारण इस देश में किसान तबाह होता जा रहा है .उन्होंने कहा कि जी डी पी में तो सात से आठ प्रतिशत की वृद्धि हो रही है जबकि खेती की विकास दर केवल २ प्रतिशत के आस पास है . उन्होंने कहा कि किसानों को जो सरकारी समर्थन मूल्य मिलता है वह बहुत कम है . उन्होंने इसके लिए भी सरकार को ज़िम्मेदार ठहराया .बहस में कई पार्टियों के सदस्यों ने हिस्सा लिया लेकिन नामजद सदस्य,मणिशंकर अय्यर ने  किसानों की समस्याओं को सही परिप्रेक्ष्य में लाने की कोशिश की. उन्होंने साफ़ कहा कि आत्महत्या करने वाले किसान वे नहीं होते जो खाद्यान्न की खेती में लगे होते हैं और आमतौर पर सरकारी समर्थन मूल्य पर निर्भर करते हैं.

किसानों की आत्मह्त्या के ज़्यादातर मामले उन इलाकों से सुनने में आ रहे हैं जहां नकदी फसल उगाई जा रही है. नकदी फसल के लिए किसानों को लागत बहुत ज्यादा लगानी पड़ती है. नकदी फसल के किसान पर देश के अंदर हो रही उथल पुथल का उतना ज्यादा असर नहीं पड़ता जितना कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रही अर्थव्यवस्था के उतार-चढाव का पड़ता है. जब उनके माल की कीमत दुनिया के बाजारों में कम हो जाती है तो उसके सामने संकट पैदा हो जाता है. वह अपनी फसल में बहुत ज़्यादा लागत लगा चुका होता है. लागत का बड़ा हिस्सा क़र्ज़ के रूप में लिया गया होता है. माल को रोकना उसके बूते की बात नहीं होती. सरकार की गैर ज़िम्मेदारी का आलम यह है कि खेती के लिए क़र्ज़ लेने वाले किसान को छोटे उद्योगों के लिए मिलने वाले क़र्ज़ से ज्यादा ब्याज देना पड़ता है.एक बार भी अगर फसल खराब हो गयी तो दोबारा पिछली फसल के घाटे को संभालने के लिए वह अगली फसल में ज्यादा पूंजी लगा देता है. अगर लगातार दो तीन साल तक फसल खराब हो गयी तो मुसीबत आ जाती है. किसान क़र्ज़ के भंवरजाल में फंस जाता है. जिसके बाद उसके लिए बाकी ज़िंदगी बंधुआ मजदूर के रूप में क़र्ज़ वापस करते रहने के लिए काम करने का विकल्प रह जाता है. किसानों की आत्म हत्या के कारणों की तह में जाने पर पता चलता है कि ज़्यादातर समस्या यही है. राज्यसभा में बहस के दौरान यह साफ़ समझ में आ गया कि ज़्यादातर सदस्य आपने इलाकों  के किसानों की समस्याओं का उल्लेख करने के एक मंच के रूप में ही समय बिताते रहे.

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सीताराम येचुरी ने समस्या के शास्त्रीय पक्ष पर बात की, सदन में भी और सदन के बाहर भी. उन्होंने सरकार की नीयत पर ही सवाल उठाया और कहा कि अपने जवाब में कृषिमंत्री ने जिस तरह से आंकड़ों का खेल किया है वह  किसानों की आत्महत्या जैसे सवाल को कमज़ोर रोशनी में पेश करने का काम करता है. उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया कि २००७ के एक जवाब में सरकार ने कहा था कि नैशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो का आंकड़ा किसानों की आत्महत्या के मामले में ही सही आंकड़ा है जबकि जब राज्यसभा में इस विषय पर हुई दो दिन की बहस का जवाब केन्द्रीय कृषि मंत्री महोदय दे रहे थे तो उन्होंने राज्य सरकारों से मिले आंकड़ों का हवाला दिया. सीताराम येचुरी ने आरोप लगाया कि यह सरकार की गलती है. कोई भी मुख्यमंत्री या राज्य सरकार आमतौर पर यह स्वीकार करने में संकोच करती है कि उसके राज्य में किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहे हैं. उन्होंने उन अर्थशास्त्रियों को भी आड़े हाथों लिया जो आर्थिक सुधारों के बल पर देश की अर्थव्यवस्था में सुधार लाने की कोशिश कर रहे हैं. सीताराम ने साफ़ कहा कि जब तक इस देश के किसान खुशहाल नहीं होगा तह तह अर्थव्यवस्था में किसी तरह की तरक्की के सपने देखना बेमतलब है. उन्होंने साफ़ कहा कि जब तक खेती में सरकारी निवेश नहीं बढाया जाएगा, भण्डारण और विपणन की सुविधाओं के ढांचागत  निवेश का बंदोबस्त नहीं होगा तब तक इस देश में किसान को वही कुछ झेलना पड़ेगा जो अभी वह झेल रहा है. उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया कि पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के नाम पर खेती से जुडी हर लाभकारी स्कीम को एमएनसी के हवाले करने की जो योजना सरकारी चर्चाओं में सुनने में आ रही है वह बहुत ही चिंताकारक है.

एक दिन की बहस के बाद जब कृषिमंत्री शरद पवार ने जवाब दिया तो लगभग तस्वीर साफ़ हो गयी कि सरकार इतने अहम मसले पर भी लीपापोती का काम करने के चक्कर में है .सरकार की तरफ से कृषि मंत्री ने एक हैरत अंगेज़ बात भी कुबूल कर डाली . उन्होंने कहा कि इस देश में २७ प्रतिशत किसान ऐसे हैं जो खेती को लाभदायक नहीं. बाद में जनता दल ( यू ) के शिवानन्द  तिवारी ने कहा कि कृषिमंत्री के बयान से लगता है कि २७ प्रतिशत किसान खेती छोड़ना चाहते हैं. उन्होंने कहा कि यह २७ प्रतिशत किसान का मतलब यह है कि देश के करीब १७ करोड़ किसान खेती से पिंड छुडाना चाहते हैं. यह बात बहुत ही चिंता का कारण है. भारत एक कृषिप्रधान देश है और यहाँ आबादी का एक बड़ा हिस्सा खेती से अलग होना चाहता है. कृषिमंत्री ने इस बात को भी स्वीकार किया कि रासायनिक खादों को भी किसानों को उपलब्ध कराने में सरकार असमर्थ है. उन्होंने कहा कि दुनिया के कई देशों में खाद उत्पादन करने वाली बड़ी कंपनियों ने गिरोह बना रखा है और वे भारत सरकार से मनमानी कीमतें वसूल कर रहे हैं. सरकार ऐसी हालत में मजबूर है. उन्होंने इस बात पार भी लाचारी दिखाई कि सरकार किसानों को सूदखोरों के जाल में जाने से नहीं बचा सकती. बहरहाल सरकार की लाचारी भरे जवाब के बाद यह साफ़ हो गया है कि इस देश में किसान को कोई भी राजनीतिक या सरकारी समर्थन मिलने वाला नहीं है. किसान को इस सरकार ने रामभरोसे छोड़ दिया है.

Advertisements

भारतीय किसान आंदोलन के जनकः स्वामी सहजानंद सरस्वती

डॉ देवकुमार पुखराज

भारत में संगठित किसान आंदोलन खड़ा करने का श्रेय स्वामी सहजानंद सरस्वती को जाता है. उन्होंने अंग्रेजी दासता के खिलाफ लड़ाई लड़ी और किसानों को जमींदारों के शोषण से मुक्त कराने के लिए निर्णायक संघर्ष किया. दण्डी संन्यासी होने के बावजूद सहजानंद ने रोटी को हीं भगवान कहा और किसानों को भगवान से बढ़कर बताया. स्वामीजी ने नारा दिया था-
जो अन्न-वस्त्र उपजाएगा ,अब सो कानून बनायेगा,
ये भारतवर्ष उसी का है, अब शासन वहीं चलायेगा।
ऐसे महान नेता,युगद्रष्टा और किसानों के मसीहा का जन्म उत्तरप्रदेश के गाजीपुर जिले के देवा गांव में सन् 1889 में महाशिवरात्रि के दिन हुआ था. स्वामीजी के बचपन का नाम नौरंग राय था. उनके पिता बेनी राय मामूली किसान थे. नौरंग जब छह साल के थे तभी उनकी माताजी का स्वर्गवास हो गया. चाची ने उनका लालन-पालन किया. कहते हैं पूत के पांव पलने में हीं दिखने लगते हैं. बालक नौरंग में भी महानता के गुण बचपन से हीं दिखने लगे. प्राथमिक शिक्षा के दौरान हीं उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाना शुरू कर दिया .पढ़ाई के दौरान हीं उनका मन आध्यात्म में रमने लगा. बालक नौरंग ये देखकर हैरान थे कि कैसे भोले-भाले लोग नकली धर्माचार्यों से गुरु मंत्र ले रहे हैं. उनके बालमन में धर्म की इस विकृति के खिलाफ पहली बार विद्रोह का भाव उठा. उन्होंने इस परंपरा के खिलाफ आवाज उठाने का संकल्प लिया. धर्म के अंधानुकरण के खिलाफ उनके मन में जो भावना पली थी कालांतर में उसने सनातनी मूल्यों के प्रति उनकी आस्था को और गहरा किया. उनके मन में वैराग्य पैदा होने लगा. घर वालों ने बच्चे की ये हाल देखी तो समय से पहले हीं उनकी शादी करा दी. लेकिन जिसके सर पर समाज और देश की दशा सुधारने का भूत सवार हो वो भला पारिवारिक जीवन में कहां बंधने वाला था. संयोग ऐसा रहा कि गृहस्थ जीवन शुरू होने के पहले हीं उनकी पत्नी भगवान को प्यारी हो गयीं. ये सन् 1905 के आखिरी दिनों की बात है. हालांकि दो साल बाद हीं उन्होंने विधिवत संन्यास लेने का फैसला किया और दशनामी दीक्षा लेकर स्वामी सहजानंद सरस्वती हो गये. बाद के सात साल उन्होंने धार्मिक ग्रंथों को पढ़ने और सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों का अध्ययन करने में बिताया. इसी दौरान उन्हें काशी में समाज की एक और कड़वी सच्चाई से रू-ब-रू होना पड़ा. दरअसल काशी के कुछ पंड़ितों ने उनके संन्यास का ये कहकर विरोध किया कि ब्राह्मणेतर जातियों को दण्ड धारण करने का अधिकार नहीं है. स्वामी सहजानंद ने इसे चुनौती के तौर पर लिया और विभिन्न मंचों पर शास्त्रार्थ कर ये साबित किया कि भूमिहार भी ब्राह्मण हीं हैं और हर योग्य व्यक्ति संन्यास ग्रहण करने की पात्रता रखता है.बाद के दिनों में ब्रह्मर्षि वंश विस्तर और भूमिहार-ब्राह्मण परिचय जैसे ग्रंथ लिखकर उन्होंने अपनी धारण को सैद्धांतिक जामा पहनाया. वैसे स्वामीजी ने जब बिहार में किसान आंदोलन शुरू किया तो उनके निशाने पर अधिकांश भूमिहार जमींदार हीं थे जो अपने इलाके में किसानों के शोषण का पर्याय बने हुए थे.
महात्मा गांधी के नेतृत्व में शुरू हुआ असहयोग आंदोलन बिहार में गति पकड़ा तो सहजानंद उसके केन्द्र में थे. घूम-घूमकर उन्होंने अंग्रेजी राज के खिलाफ लोगों को खड़ा किया. इस अभियान ने युवा संन्यासी को गांव-देहात की स्थिति को नजदीक से देखने का पर्याप्त अवसर दिया. लोग ये देखकर अचरज में पड़ जाते कि गेरूआ वस्त्रधारी ये कैसा संन्यासी है जो मठ-मंदिरों में तप साधना करने की बजाय दलितों-वंचितों की स्थिति को जानने-समझने में अपनी ऊर्जा खपा रहा है. ये वो समय था जब स्वामी जी भारत को समझ रहे थे. इस क्रम में उन्हें एक अजूबा अनुभव हुआ. स्वामीजी ने देखा कि अंग्रेजी शासन की आड़ में जमींदार गरीब किसानों पर जुल्म ढा रहे हैं. बिहार के गांवों में गरीब लोग अंग्रेजो से नहीं वरन् गोरी सत्ता के इन भूरे दलालों से आतंकित हैं. किसानों की हालत गुलामों से भी बदतर है. युवा संन्यासी का मन एक बार फिर नये संघर्ष की ओर उन्मुख होता है. वे किसानों को लामबंद करने की मुहिम में जुटतें हैं. सन् 1929 में उन्होंने बिहार प्रांतीय किसान सभा की नींव रखी. इस मंच से उन्होंने किसानों की कारुणिक स्थिति को उठाया. जमींदारों के शोषण से मुक्ति दिलाने और जमीन पर रैयतों का मालिकाना हक दिलाने की मुहिम शुरू की. इस रूप में देखें तो भारत के इतिहास में संगठित किसान आंदोलन खड़ा करने और उसका सफल नेतृत्व करने का एक मात्र श्रेय स्वामी सहजानंद सरस्वती को जाता है. कांग्रेस में रहते हुए स्वामीजी ने किसानों को जमींदारों के शोषण और आतंक से मुक्त कराने का अभियान जारी रखा. उनकी बढ़ती सक्रियता से घबड़ाकर अंग्रेजों ने उन्हें जेल में डाल दिया. कारावास के दौरान गांधीजी के कांग्रेसी चेलों की सुविधाभोगी प्रवृति को देखकर स्वामीजी हैरान रह गये. उन्होंने देखा कि जेल में बंद कांग्रेस के कार्यकर्ता और नेता सुविधापूर्वक जीने के लिए कैसे-कैसे हथकंड़े अपना रहे हैं. स्वभाव से हीं विद्रोही स्वामीजी का कांग्रेस से मोहभंग होना शुरू हो गया. जब1934 में बिहार प्रलयंकारी भूकंप से तबाह हुआ तब स्वामीजी ने बढ़-चढ़कर राहत और पुनर्वास के काम में भाग लिया. इस दौरान स्वामीजी ने देखा कि प्राकृतिक आपदा में अपना सबकुछ गंवा चुके किसानों को जमींदारों के लठैत टैक्स देने के लिए प्रताड़ित कर रहे है. उन्होंने तब पटना में कैंप कर रहे महात्मा गांधी से मिलकर किसानों की दशा बतायी और दोहरी मार से मुक्ति दिलाने के लिए प्रयास करने की मांग की. जवाब में गांधीजी ने कहा कि जमींदारों के अधिकांश मैनेजर कांग्रेस के कार्यकर्ता है .वे निश्चित तौर पर गरीबों की मदद करेंगे. गांधीजी ने दरभंगा महाराज से मिलकर भी किसानों के लिए जरूरी अन्न का बंदोबस्त करने के लिए स्वामीजी से कहा. कहते है कि गांधीजी की ऐसी बातें सुनकर स्वामी सहजानंद आग बबूला हो गये और तत्काल वहां से ये कहकर चल दिए कि किसानों का सबसे पड़ा शोषक तो दरभंगा राज हीं है. मैं उससे भीख मांगने कभी नहीं जाऊंगा.इस घटना ने कांग्रेस नेताओं की कार्यशैली से नाराज चल रहे स्वामीजी का गांधीजी से भी पूरी तरह मोहभंग कर दिया.विद्रोही सहजानंद ने एक झटके में हीं चौदह साल पुराना संबंध तोड़ दिया और किसानों को हक दिलाने के लिए संघर्ष को हीं जीवन का लक्ष्य घोषित कर दिया. उन्होंने नारा दिया -कैसे लोगे मालगुजारी,लट्ठ हमारा जिन्दाबाद. बाद में यहीं नारा किसान आंदोलन का सबसे प्रिय नारा बन गया.वे कहते थे ,अधिकार हम लड़ कर लेंगे और जमींदारी का खात्मा करके रहेंगे. उनका ओजस्वी भाषण किसानों पर गहरा असर डालता था. काफी कम समय में किसान आंदोलन पूरे बिहार में फैल गया. स्वामीजी का प्रांतीय किसान सभा संगठन के तौर पर खड़ा होने के बजाए आंदोलन बन गया. इस दौरान किसानों की सैकड़ों रैलियां और सभाएँ हुई. बड़ी संख्या में किसान स्वामीजी को सुनने आते थे. बाद के दिनों में उन्होंने कांग्रेस के समाजवादी नेताओं से हाथ मिलाया. अप्रैल,1936 में कांग्रेस के लखनऊ सम्मेलन में अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना हुई और स्वामी सहजानंद सरस्वती को उसका पहला अध्यक्ष चुना गया. एम जी रंगा, ई एम एस नंबूदरीपाद, पंड़ित कार्यानंद शर्मा, पंडित यमुना कार्यजी,आचार्य नरेन्द्र देव, राहुल सांकृत्यायन, राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, पंडित यदुनंदन शर्मा, पी. सुन्दरैया और बंकिम मुखर्जी जैसे तब के कई नामी चेहरे किसान सभा से जुड़े थे. सभा ने उसी साल किसान घोषणा पत्र जारी कर जमींदारी प्रथा के समग्र उन्मूलन और किसानों के सभी तरह के कर्ज माफ करने की मांग उठाई. अक्टूबर 1937 में सभा ने लाल झंड़ा को संगठन का निशान घोषित किया.किसानों के हक की लड़ाई बड़े पैमाने पर लड़ी जाने लगी थी. दस्तावेज बताते हैं कि स्वामी सहजानंद के नेतृत्व में किसान रैलियों में जुटने वाली भीड़ कांग्रेस की सभाओं में आने वाली भीड़ से कई गुना ज्यादा होती थी.संगठन की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 1935 में इसकी सदस्यों की संख्या अस्सी हजार थी जो 1938 में बढ़कर दो लाख पचास हजार हो गयी. शायद यहीं वजह हुआ कि इसके नेताओं की कांग्रेस से दूरियां बढ़ गयी. वैसे बिहार और संयुक्त प्रांत में कांग्रेस सरकार के साथ कई बार इनकी तीखी झड़पें भी हुई. किसान आंदोलन के संचालन के लिए पटना के समीप बिहटा में उन्होंने आश्रम स्थापित किया. वो सीताराम आश्रम आज भी है .
किसान हितों के लिए आजीवन सक्रिय रहे स्वामी सहजानंद ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के साथ कई रैलियां की. वे उनके फारवॉड ब्लॉक से भी निकट रहे. सीपीआई भी स्वामीजी को अपना आदर्श मानती रही. आजादी की लड़ाई के दौरान जब उनकी गिरफ्तारी हुई तो नेताजी ने 28 अप्रैलप्रैल को ऑल इंडिया स्वामी सहजानंद डे घोषित कर दिया. बिहार के प्रमुख क्रांतिकारी लोक कवि बाबा नागार्जुन भी स्वामीजी से अति प्रभावित थे. उन्होंने वैचारिक झंझावातों के दौरान बिहटा आश्रम में जाकर स्वामीजी से मार्गदर्शन प्राप्त किया था.
स्वामी सहजानंद संघर्ष के साथ हीं सृजन के भी प्रतीक पुरूष हैं. अपनी अति व्यस्त दिनचर्या के बावजूद उन्होंने कोई दो दर्जन से ज्यादा पुस्तकों की रचना की. सामाजिक व्यवस्था पर जहां उन्होंने भूमिहार ब्राह्मण परिचय, झूठा भय मिथ्या अभिमान, ब्राह्मण कौन,ब्राह्मण समाज की स्थिति जैसी पुस्तकें हिन्दी में लिखी वहीं ब्रह्मर्षि वंश विस्तर और कर्मकलाप नामक दो ग्रंथों का प्रणयन संस्कृत और हिन्दी में किया.उनकी आत्मकथा मेरा जीवन संघर्ष के नाम से प्रकाशित है. आजादी की लड़ाई और किसान आंदोलन के संघर्षों की दास्तान उनकी -किसान सभा के संस्मरण,महारुद्र का महातांडव,जंग और राष्ट्रीय आजादी, अब क्या हो,गया जिले में सवा मास आदि पुस्तकों में दर्ज हैं. उन्होंने गीता ह्रदय नामक भाष्य भी लिखा .
किसानों को शोषण मुक्त करने और जमींदारी प्रथा के खिलाफ लड़ाई लड़ते हुए स्वामी जी 26 जून ,1950 को महाप्रयाण कर गये. उनके जीते जी जमींदारी प्रथा का अंत नहीं हो सका. लेकिन उनके द्वारा प्रज्जवलित ज्योति की लौ आज भी बुझी नहीं है. आजादी मिलने के साथ हीं जमींदारी प्रथा को कानून बनाकर खत्म कर दिया गया. लेकिन प्रकारांतर से देश में किसान आज भी शोषण -दोहन के शिकार बने हुए हैं. कर्ज और भूख से परेशान किसान आत्महत्या कर रहे हैं. आज यदि स्वामीजी होते तो फिर लट्ठ उठाकर देसी हुक्मरानों के खिलाफ संघर्ष का ऐलान कर देते. लेकिन दुर्भाग्य से किसान सभा भी है. उनके नाम पर अनेक संघ और संगठन सक्रिय हैं. लेकिन स्वामीजी जैसा निर्भीक नेता दूर -दूर तक नहीं दिखता. उनके निधन के साथ हीं भारतीय किसान आंदोलन का सूर्य अस्त हो गया. राष्ट्रकवि दिनकर के शब्दों में दलितों का संन्यासी चला गया.
-पुखराज

Banana fibre in Bihar: the remarkable story of an industry and an entrepreneur!

Patna: Bihar farmers plant banana in around 28,000 hectares of land every year. The banana plant is the largest herbaceous flowering plant. The plants are normally tall and fairly sturdy and are often mistaken for trees, but their main or upright stem is actually a pseudostem that grows 6 to 7.6 metres (20 to 24.9 ft) tall, growing from a corm.

Each pseudostem can produce a single bunch of bananas. After fruiting, the pseudostem dies, but offshoots may develop from the base of the plant. Many varieties of bananas are perennial.

banana fibre arrangedThe relevant point here however is, the stem invariably goes waste. On the whole 22 districts in Bihar grow banana, some of them on a vast scale. Each acre of banana plantation may have up to 1300 tress. This may give you some idea of the banana waste output of entire Bihar. So what should be done?

According to standard data, not widely known in Bihar, a full 1 km of fibre may be extracted from 12-15 banana trees. A plantation thus with 1300 trees can give a producer 85 kms of fibre length. But what are the uses of the banana fibre? And this is where the producer may hit the jackpot.

banana fibre mats

Banana fibre is used in a variety of industries starting with high quality paper to weaving of saris in South India and Gujarat. The fibre also finds use in high quality security/currency paper, packing cloth, ship towing ropes, wet drilling cables etc.

India also occupies the largest area under Banana cultivation in the world covering approx. 11% of world area of Banana. Banana fiber can partially replace the consumption of Cotton and Jute fiber in India. It has excellent potential for export to Far-east Asian and South Asian countries like Singapore,Taiwan, Japan, Thailand, Sri Lanka and Malaysia.

Banana farmers and entrepreneurs in Bihar are thus sitting on a gold mine that they are not aware of. There is one person however who has taken the initiative in Bihar. Virendra Dayal who has a small scale unit in Bidupur, Vaishali took the trouble to get himself trained in the technique of fibre extraction before he put up his industry. He now says he has captive clients who pick up his produce and he doesn’t have to go chasing after them – a major advantage in the case of Bihar where farmers often find tough to seek markets.

Mr Dayal lays down a simple calculation to explain the profitability of the industry – one acre of land will give you 1200 stems approximately. Roughly 12 stems give you around 1 kilo of fibre. Companies willingly pay Rs 150-200 for a kilo of fibre. He started his industry with a machine he bought for the royal sum of Rs 80,000 and a large room as a factory. He is now planning to upgrade the machine with an investment of Rs 150,000. Does that give you an idea of the scale of investment?

banana basket bihardays

You can do the rest of the calculation yourself. Mr dayal does not forget to add that the banana stem juice may be processed into high value molasses as well.  So far we have thought of banana fibre from the entrepreneur’s viewpoint. Once you include the farmer and the local labour employed, you get a complete picture of the potential of this industry.


Agri Activities on Twitter

Enter your email address to subscribe to this blog and receive notifications of new posts by email.

Join 9 other followers

Archives

Agri Stats

  • 15,364 hits