बी आर ए आई बिल विधेयक को लेकर घमासान , किसान संगठनों ने आन्दोलन की दी चेतावनी

बिहार ऑब्जर्वर:पटना,  राष्ट्रीय जैव प्रौद्यागिकी नियामक प्राधिकरण विधेयक (बी आर ए आई बिल) दिनांक अप्रैल को केन्द्रीय विज्ञान एवं तकनीकी तथा पृथ्वी विज्ञान मंत्री श्री जयपाल रेड्डी द्वारा केंद्रीय लोक सभा में बड़े नाटकीय ढंग से पेश कर दिया गया. विदित हो कि केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा राष्ट्रीय जैव प्रौद्यागिकी नियामक प्राधिकरण विधेयक (BRAI Bill,बायोटेक्नोलॉजी रेगुलेटरी ऑथीरटी ऑफ इन्डिया बिल) कि मंजूरी दे दी गई थी जो संसद में विगत दो वर्षों से लंबित था. इसका मुख्य कारण है कि इस् बिल में राज्यों के संवैधानिक अधिकारों को छीनने की कोशिश की गई हैं साथ ही साथ इसके पारित होने से सूचना के अधिकार अधिनियम एवं पर्यावरण संरक्षण अधिनियम का भी हनन होगा तथा हमारी खाद्य सुरक्षा एवं किसानी पर बड़ा सवाल खड़ा होगा।

यह बातें जी एम मुक्त बिहार अभियान के संयोजक एवं कोलीशन फॉर जी एम फ्री इंडिया के सह संयोजक पंकज भूषण ने कहा।श्री भूषण ने केन्द्रीय विज्ञान एवं तकनीकी तथा पृथ्वी विज्ञान मंत्री श्री जयपाल रेड्डी को पत्र भेजते हुए निवेदन कहा कि इस् बिल पर तुरत ही रोक लगायी जाये साथ हीं उन्होंने बिहार के मुख्य मंत्री को पत्र के माध्यम से अनुरोध किया है की अविलम्ब इस् बिल को रोकने की शिफारिश की जाये, साथ हीं उन्होंने यह भी अनुरोध किया की यदि इस् बिल पर रोक नहीं लगती है तब इसे संयुक्त समिति को अग्रसारित किया जाये या संसदीय कृषि समिति को दिया जाये।विदित हो कि इस् बिल के विरुद्ध बिहार के पूर्व मुख्य मंत्री एवं सांसद श्री रामसुंदर दास, पूर्व केंद्रीय मंत्री-सांसद एवं तत्कालीन भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष डा० सी पी ठाकुर, सांसद एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री कैप्टन जय नारायण निषाद, सांसद श्रीमती अश्वमेधा देवी, तत्कालीन सांसद स्व० उमा शंकर सिंह, सांसद ओम् प्रकाश यादव, सांसद डा० अनिल कुमार साहनी, पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं सांसद रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे कई सांसदों ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी ताकि यह बिल संसद में पेश नहीं किया जाये, परन्तु केंद्र सरकार ने बगैर कोई संसोधन के इस् बिल को लोक सभा में पेश कर दिया. प्रस्तावित विधेयक में जन सहभागिता के लिए कोई जगह नहीं है।

जैव विविधता के बारे में कार्टाजेना प्रोटोकॉल (जैव विविधता समझौते के तहत) के अनुच्छेद 23.2 में साफ कहा गया है कि जी0 एम0 के मामले में फैसला लेते समय जन सहभागिता भी सुनिश्चित की जानी चाहिए। भारत इस संधि का हस्ताक्षरकर्ता है। इससे एक तरफ राष्ट्र के नागरिकों के हक का भी हनन होगा और दूसरी तरफ पर्यावरण पर भी गंभीर खतरे के बादल मंडराने लगेंगे।

इस् विधेयक में कृषि और स्वास्थ्य पर राज्यों के संवैधानिक अधिकार को छीनने की कोशिश की गई है जो कि देश के संघीय ढ़ाँचें की व्यवस्था का घोर उल्लंघन है। प्रस्तावित विधेयक में राज्य सरकारों को राज्य बायोटेक्नोलॉजी नियामक सलाहकार समिति में सिर्फ सलाह देने तक ही सीमित रखा गया है। इसे दो कारणों से स्वीकारा नहीं जा सकता है। पहला कृषि और स्वास्थ्य राज्य का विषय है और दूसरा इसमें जैव विविधता कानून बनाने के राज्यों से अधिकार को छीना जा रहा है। ऐसे में यह फैसला जैव विविधता के संरक्षण और उसे बरकरार रखने के लिए एक विकेन्द्रीकृत प्राधिकरण की व्यवस्था का भी उल्लंघन है। खाशकर इस समय यह बिल बहुराष्ट्रीय कंपनियों के स्वार्थ में पेश किया गया है जब बिहार, केरल, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, छत्तीसगढ़ ओडिशा एवं पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों ने जी एम फसलों के परिक्षण को मना कर चुके हैं।

अब देश भर के हजारों गांव खुद को जीएम मुक्त घोषित कर रहे हैं।जी एम फ्री बिहार के संयोजक बबलू कुमार ने कहा कि यह जग जाहिर हो चुका है कि बिहार के मुख्य मंत्री के पहल पर बिहार में बी टी बैंगन की खेती एवं जी एम मक्के का परिक्षण रुका, साथ हीं एक नियम भी बन गया कि किसी तरह के परिक्षण के पूर्व राज्य सरकार की अनुमति आवश्यक होगी। फिर इस बिल का क्या अचित्य है? अतः उन्होंने मुख्य मंत्री बिहार से माँग की है कि जैसे बिहार सरकार ने बीज विधेयक पर किसानों के स्वार्थ में घनघोर आपत्ति की थी उसी प्रकार बिहार सरकार हमारी किसानी एवं पर्यावरण की रक्षा हेतु पुनः इस् बिल पर आपति प्रकट करते हुए केंद्र सरकार को अपने मंतव्य से अवगत करावे. उन्होंने कहा कि जिस तरह मध्य प्रदेश सरकार द्वारा कड़ी आपत्ति दर्ज करते हुए केंद्र को प्रस्ताव भेजा जा चुका है, उसी तरह बिहार सरकार भी अविलम्ब आपत्ति दर्ज करे ताकि हमारी किसानी बच सके।

अभी हाल में प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक एम. एस. स्वामीनाथन ने कहा कि यह बिल महात्मा गाँधी की भावना के विरुद्ध है, जिसमे खाशकर जैव परिवर्धित फसलों की स्वीकृति के लिए एकल खिड़की की व्यवस्था है। साथ हीं सूचना के जन अधिकार का राष्ट्रीय अभियान से जुड़ीं राष्ट्रीय सलाहकार समिति की सदस्या एवं समाजसेवी अरुणा राय ने भी हाल में हीं प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से इस विधेयक के धारा 2, 28, 70, 77 पर कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए कहा कि इस विधेयक के पारित होने के बाद इससे संबंधित कोई भी सूचना प्राप्त नहीं होगा और उसे गोपनीय ठहरा दिया जाएगा जो कि सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 का सरासर उल्लंघन है। जिससे भारतीय गणतंत्र के नागरिकों के अधिकारों का हनन होगा।

किसान-मजदूर गठबन्धन के प्रदेश अध्यक्ष कृष्णा सिंह ने कहा कि यह बिल बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बहकावे में आकर केंद्र सरकार ने पेश किया है जिससे हमारी किसानी तबाह हो जायेगी, जिन जैव परिवर्धित बीजों (जी एम) को बिहार सरकार ने रोककर एक ऐतिहासिक कार्य किया है, अब इस् बिल के आ जाने के बाद पुनः काविज हो जायेगा. उन्होंने कहा कि अंतिम चरण तक हम इस् बिल के खिलाफ लड़ेंगे और जरूरत हुई तब गठबन्धन इस् के लिय आन्दोलन भी शुरू करेगा. खाद्य सुरक्षा पर बल देते हुए कहा कि यह भी ध्यान रखने योग्य है कि हमारा भोजन असुरक्षित होता जा रहा है। जीएम फसलों व खाद्यान्न के आने से उसके जहरीले होने की संभावना भी बढ़ गई है। इसीलिए इस बिल के पेश किये जाने का विरोध करने की जरूरत है।

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